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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
अभिहत्य शरौघैस्तं शतशोऽथ सहस्रशः |  ८०   क
न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रेष्वङ्गुलमात्रकम् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति