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कर्ण पर्व
अध्याय २४
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दुर्योधन उवाच
ततो मय़ः स्वतपसा चक्रे धीमान्पुराणि ह |  १४   क
त्रीणि काञ्चनमेकं तु रौप्यं कार्ष्णाय़सं तथा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति