कर्ण पर्व  अध्याय २४

दुर्योधन उवाच

अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमथाव्रुवन् |  १४४   क
प्रसादय़न्तस्तं भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ||  १४४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति