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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
जातिस्मर उपस्पृश्य शुचिः प्रय़तमानसः |  ११०   क
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति स्नात्वा तत्र न संशय़ः ||  ११०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति