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कर्ण पर्व
अध्याय २४
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दुर्योधन उवाच
वृजिनं हि भवेत्किञ्चिद्यदि कर्णस्य पार्थिव |  १५८   क
नास्मै ह्यस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यद्भृगुनन्दनः ||  १५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति