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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
गतेन तेनास्मि कृतो विचेता; गात्रं च मे सम्परितप्यतीव |  १७   क
इच्छामि तस्यान्तिकमाशु गन्तुं; तं चेह नित्यं परिवर्तमानम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति