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अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
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भीष्म उवाच
स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किञ्चन |  ३   क
तदेव चिन्तय़ामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति