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अनुशासन पर्व
अध्याय ४
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भीष्म उवाच
अङ्घ्रिको नैकभृच्चैव शिलाय़ूपः सितः शुचिः |  ५३   क
चक्रको मारुतन्तव्यो वातघ्नोऽथाश्वलाय़नः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति