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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः शिखण्डी च महारथः |  १६   क
नाकुलिश्च शतानीको रथानीकमय़ोधय़न् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति