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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा तु हतविक्रान्तं स्वमनीकं महावलः |  २२   क
तव पुत्रो महाराज प्रय़यौ यत्र सौवलः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति