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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नस्तु समरे पराजित्य नराधिपम् |  ३४   क
अपक्रान्ते तव सुते हय़पृष्ठं समाश्रिते ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति