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उद्योग पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
जनार्दनं चापि समेत्य तात; महामात्रं वीर्यवतामुदारम् |  ३६   क
अनामय़ं मद्वचनेन पृच्छे; र्धृतराष्ट्रः पाण्डवैः शान्तिमीप्सुः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति