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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
अदृष्ट्वा तु रथानीके दुर्योधनमरिन्दमम् |  ३६   क
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः |  ३६   ख
अपृच्छन्क्षत्रिय़ांस्तत्र क्व नु दुर्योधनो गतः ||  ३६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति