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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
श्रुत्वा तु वचनं तेषामश्वत्थामा महावलः |  ४२   क
हित्वा पाञ्चालराजस्य तदनीकं दुरुत्सहम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति