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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तेषु प्रय़ातेषु धृष्टद्युम्नपुरोगमाः |  ४४   क
आय़युः पाण्डवा राजन्विनिघ्नन्तः स्म तावकान् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति