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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
परिक्षीणाय़ुधान्दृष्ट्वा तानहं परिवारितान् |  ४६   क
राजन्वलेन द्व्यङ्गेन त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति