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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
परित्यज्य च पाञ्चालं प्रय़ाता यत्र सौवलः |  ५६   क
राज्ञोऽदर्शनसंविग्ना वर्तमाने जनक्षय़े ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति