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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
तानन्ये रथमारोप्य समाश्वास्य मुहूर्तकम् |  ९   क
विश्रान्ताश्च वितृष्णाश्च पुनर्युद्धाय़ जग्मिरे ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति