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शान्ति पर्व
अध्याय २४०
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व्यास उवाच
यथा वारिचरः पक्षी न लिप्यति जले चरन् |  १६   क
एवमेव कृतप्रज्ञो न दोषैर्विषय़ांश्चरन् |  १६   ख
असज्जमानः सर्वेषु न कथञ्चन लिप्यते ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति