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शान्ति पर्व
अध्याय २४०
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व्यास उवाच
इन्द्रिय़ाणां पृथग्भावाद्वुद्धिर्विक्रिय़ते ह्यणु |  ४   क
शृण्वती भवति श्रोत्रं स्पृशती स्पर्श उच्यते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति