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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य लाङ्गूलनिनदं पर्वतः स गुहामुखैः |  ६१   क
उद्गारमिव गौर्नर्दमुत्ससर्ज समन्ततः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति