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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैश्रवण उवाच
त्वं चाप्येभिर्हतैः सैन्यैः क्लेशं प्राप्स्यसि दुर्मते |  ५७   क
तमेव मानुषं दृष्ट्वा किल्विषाद्विप्रमोक्ष्यसे ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति