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वन पर्व
अध्याय २४०
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्णोऽप्याविष्टचित्तात्मा नरकस्यान्तरात्मना |  ३२   क
अर्जुनस्य वधे क्रूरामकरोत्स मतिं तदा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति