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वन पर्व
अध्याय २४०
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वैशम्पाय़न उवाच
परिष्वज्याव्रवीच्चैनं भुजाभ्यां स महाभुजः |  ३७   क
उत्तिष्ठ राजन्किं शेषे कस्माच्छोचसि शत्रुहन् |  ३७   ख
शत्रून्प्रताप्य वीर्येण स कथं मर्तुमिच्छसि ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति