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वन पर्व
अध्याय २४०
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन दैत्यानां वचनात्तथा |  ४०   क
प्रणिपातेन चान्येषामुदतिष्ठत्सुय़ोधनः |  ४०   ख
दैत्यानां तद्वचः श्रुत्वा हृदि कृत्वा स्थिरां मतिम् ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति