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वन पर्व
अध्याय २४०
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वैशम्पाय़न उवाच
सुय़ोधनो यय़ावग्रे श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् |  ४५   क
कर्णेन सार्धं राजेन्द्र सौवलेन च देविना ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति