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वन पर्व
अध्याय २४०
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वैशम्पाय़न उवाच
रथैर्नानाविधाकारैर्हय़ैर्गजवरैस्तथा |  ४७   क
प्रय़ान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मुः कुरूद्वहाः |  ४७   ख
कालेनाल्पेन राजंस्ते विविशुः स्वपुरं तदा ||  ४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति