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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
यदपश्यं सभाय़ां त्वां राजभिः परिवारितम् |  १२   क
तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति