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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
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धृतराष्ट्र उवाच
देशान्तरस्थाश्च नरा विक्रान्ताः सर्वकर्मसु |  १५   क
मात्राभिरनुरूपाभिरनुग्राह्या हितास्त्वय़ा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति