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वन पर्व
अध्याय २४१
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वैशम्पाय़न उवाच
सहाय़श्चानुरक्तश्च मदर्थं च समुद्यतः |  १८   क
अभिप्राय़स्तु मे कश्चित्तं वै शृणु यथातथम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति