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वन पर्व
अध्याय २४१
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वैशम्पाय़न उवाच
राजसूय़ं पाण्डवस्य दृष्ट्वा क्रतुवरं तदा |  १९   क
मम स्पृहा समुत्पन्ना तां सम्पादय़ सूतज ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति