वन पर्व  अध्याय २४१

जनमेजय़ उवाच

कर्णो वैकर्तनश्चापि शकुनिश्च महावलः |  २   क
भीष्मद्रोणकृपाश्चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति