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वन पर्व
अध्याय २४१
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वैशम्पाय़न उवाच
राजसूय़ं क्रतुश्रेष्ठं समाप्तवरदक्षिणम् |  २५   क
आहर त्वं मम कृते यथान्याय़ं यथाक्रमम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति