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वन पर्व
अध्याय २४१
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः |  ३१   क
प्रवर्ततां यथान्याय़ं सर्वतो ह्यनिवारितः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति