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शान्ति पर्व
अध्याय २४२
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शुक उवाच
यस्माद्धर्मात्परो धर्मो विद्यते नेह कश्चन |  १   क
यो विशिष्टश्च धर्मेभ्यस्तं भवान्प्रव्रवीतु मे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति