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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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कर्ण उवाच
कृपश्च भोजश्च तथात्मजश्च ते; तमोनुदं वारिधरा इवापतन् |  ६२   क
कृपस्य पार्थः सशरं शरासनं; हय़ान्ध्वजं सारथिमेव पत्रिभिः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति