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शान्ति पर्व
अध्याय २४२
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व्यास उवाच
भूमिष्ठानीव भूतानि पर्वतस्थो निशामय़ |  १८   क
अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च ननृशंसमतिस्तथा |  १८   ख
ततो द्रक्ष्यसि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति