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वन पर्व
अध्याय २४२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु शिल्पिनः सर्वे अमात्यप्रवराश्च ह |  १   क
विदुरश्च महाप्राज्ञो धार्तराष्ट्रे न्यवेदय़त् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति