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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
दर्शं च पौर्णमासं च ये यजन्ति तपोधनाः |  ३०   क
तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशुय़ाजिनाम् |  ३०   ख
व्रजन्तं लोकममलमपश्यद्देवपूजितम् ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति