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आदि पर्व
अध्याय १५१
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वैशम्पाय़न उवाच
भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः |  ५   क
विवृत्य नय़ने क्रुद्ध इदं वचनमव्रवीत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति