शान्ति पर्व  अध्याय २४३

व्यास उवाच

सर्वान्वेदानधीय़ीत शुश्रूषुर्व्रह्मचर्यवान् |  २   क
ऋचो यजूंषि सामानि न तेन न स व्राह्मणः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति