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वन पर्व
अध्याय ५३
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वृहदश्व उवाच
हंसानां वचनं यत्तत्तन्मां दहति पार्थिव |  ३   क
त्वत्कृते हि मय़ा वीर राजानः संनिपातिताः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति