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द्रोण पर्व
अध्याय ७३
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सञ्जय़ उवाच
उत्पतद्भिरिवाकाशं क्रमद्भिरिव सर्वतः |  ५   क
रुक्मपुङ्खाञ्शरानस्यन्युय़ुधानमुपाद्रवत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति