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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीत्सुहृदश्चापि पार्श्वस्थान्नृपसत्तमः |  १४   क
कदा तु तं क्रतुवरं राजसूय़ं महाधनम् |  १४   ख
निहत्य पाण्डवान्सर्वानाहरिष्यामि कौरवाः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति