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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रस्य शिविरे मय़ा प्रणिहिताश्चराः |  ४   क
त इमे शीघ्रमागम्य प्रवृत्तिं वेदय़न्ति नः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति