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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र विसृज्य नरपुङ्गवान् |  १७   क
प्रविवेश गृहं श्रीमान्यथा चैत्ररथं प्रभुः |  १७   ख
तेऽपि सर्वे महेष्वासा जग्मुर्वेश्मानि भारत ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति