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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
अपरे त्वव्रुवंस्तत्र वातिकास्तं महीपतिम् |  ३   क
युधिष्ठिरस्य यज्ञेन न समो ह्येष तु क्रतुः |  ३   ख
नैव तस्य क्रतोरेष कलामर्हति षोडशीम् ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति