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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं तत्राव्रुवन्केचिद्वातिकास्तं नरेश्वरम् |  ४   क
सुहृदस्त्वव्रुवंस्तत्र अति सर्वानय़ं क्रतुः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति