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वन पर्व
अध्याय २४४
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वैशम्पाय़न उवाच
उक्तो रात्रौ मृगैरस्मि स्वप्नान्ते हतशेषितैः |  ११   क
तनुभूताः स्म भद्रं ते दय़ा नः क्रिय़तामिति ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति