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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं न पश्यामि नापि कर्णं महारथम् |  १४   क
नापि तान्सुहृदः सर्वान्किमिदं भरतर्षभ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति